Shradhaanjali Suman

Brahmaleen PP Swami Samvit Som Giriji Maharaj

अत्यधिक दुःखद सूचना मिली कि मारवाड़धरालाडले श्रद्धेय स्वामीश्री संवित् सोमगिरीजी महाराज (बीकानेर)  कोरोना से जंग लड़ते हुए भौतिक देह का त्याग कर ब्रह्मलीन हो गए हैं। पूज्य स्वामी जी महाराज जैसे महापुरुषों से ही हमारी सनातन संस्कृति जीवित है,थी और रहेगी।भगवान श्रीकृष्ण ने अपने लीला विग्रह के त्याग से पूर्व उद्धव जी को  देह त्यागने से इसिलिए मना किया कि मैं भगवान संसार में सशरीर  रहूँ या ना रहूँ  कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता परन्तु निर्लिप्त सन्तों की  धरती पर प्राणिमात्र को सदैव जरूरत है।यद्यपि आत्मारूपेण महाराजश्री सदाप्रत्यक्ष है किन्तु शरीर से भगवद्गीता के द्वारा बालकों युवाओं एवं पुरे समाज को धर्म व सत्य का मार्ग दिखाया ।यह असाधारण कार्य पूज्य महाराजी से ही संभव हुआ है। उनके अशरीर होने पर शरीरसंबन्ध से होनेवाले सत्कार्यों की अपूर्णीय क्षति हुई है। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि पूज्य स्वामीजी के प्रति आस्थावान भक्तसमाज व हम सन्तवर्ग को महाराज जी के शरीरवियोग की दुःखद घटना को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
श्रद्धावनत-- स्वामी जगदीशपुरी
महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी श्री जगदीशपुरीजी महाराज ,
शकरगढ़ , भीलवाड़ा

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।।पूज्य संवित सोम गिरिजी महाराज को कोटि कोटि नमन।।
।।राष्ट्र ने एक महान संत, विचारक खो दिया, अपूर्ण क्षति समाज व सनातन धर्म के लिए।।
।।हमारे बड़े भाग, जो उनका सान्निध्य व आशीर्वाद  मिला।।
बीकानेर से बाहर होने के कारण अंतिम दर्शन करने के लिए उपस्तिथ नहीं हो सका, मलाल रहेगा।
अनन्त प्रार्थनाएँ, 
भावभीनी श्रद्धांजलि।।
ॐ शांतिः! शांतिः! शांतिः!
कृष्ण -  स्नेह एवम समस्त पुरोहित परिवार, दिल्ली, बीकानेर, जोगलिया, गुवाहाटी।।

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ओ३म् मंगलं,ओमकार मंगलं।
प्राकट्य दिवस मंगलवार मंगलं।
कार्तिक शुक्ल एकादशी मंगलं।
संवित् सोमगिरी महाराज मंगलं।
श्रीविवेकानंद निज उपनाम मंगलं।
भुवन शंकरी साधना ध्यान मंगलं।
पावन अर्बदाँचल तपोभूमि मंगलं।
वेदांत गहन स्वाध्याय नित मंगलं।
आध्यात्मिक अभियंता गुरु मंगलं।
श्रीशिवबाड़ी मठ अधिष्ठाता मंगलं।
श्रीलालेश्वर महादेव मन्दिर मंगलं।
महान् संतवर श्री बीकानेर मंगलं।
मानव प्रबोधन प्रयास जग मंगलं।
विश्व गीताजी प्रसार प्रचार मंगलं।
स्थितप्रज्ञ मनोदशा जगत्  मंगलं।
दिव्य योग साधना संस्थान मंगलं।
पर्यावरण संरक्षण  प्रतिज्ञा मंगलं।
सर्व आत्म परिचय पुस्तिका मंगलं।
निरंजन स्तुति प्रभु नीलकण्ठ मंगलं।
जप साधना श्रीसद्गुरु विचार मंगलं।
कालजयी सनातन धर्मसम्मान मंगलं
शिव आनन्द लहरी ग्रन्थरचना मंगलं।
वाक्य शुद्ध निज आत्मभावना मंगलं।
शिव संकल्प स्मारिका विरचित मंगलं
'मानव विकास साधना' वचन मंगलं। 
आदि शंकराचार्य जीवनी विधा मंगलं
'संवित् सुधा'मनीषी गुरु सारांश मंगलं
'दूर कहीं से पास' काव्य संग्रह मंगलं।
महाभारत कथा विवेचना गूढ़ मंगलं।
कनक धारा स्त्रोतम् ऊर्जावान मंगलं।
सनातन संस्कृति विज्ञान राष्ट्र मंगलं।
'जीवन रहस्य'अभिव्यक्ति जग मंगलं।
मृत्युंजयी साधना गुरुदेव मन्त्र मंगलं।
श्री शिव महिमा स्त्रोतम् विधा मंगलं।
श्रीमद् भगवद् गीता निष्कर्ष मंगलं।।
हिन्दू धर्मजनजागृति मंचप्रण मंगलं।
विमर्शानन्दगिरी ज्येष्ठ शिष्य मंगलं।।
महात्मा वैशाख सप्तमी मोक्ष मंगलं।

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परम पूज्य स्वामीजी श्री संवित सोमगिरीजी महाराज के जाने से हमारे  जीवन में एक अपूर्णीय क्षति हुई है। उन्होंने मानव मात्र को जीवन की राह दिखाई। उनके जाने से भारतवर्ष के अध्यात्म जगत को गहरा आघात पहुंचा है। हमारा पूरा परिवार शोक में निमग्न है।  जीवनमुक्त गुरुदेव के चरणों में कोटि कोटि साष्टांग प्रणाम एवं हमारी अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि। 

उमादेवी गिरधारीलाल सराफ, अहमदाबाद

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अद्वैत की एक प्रभावी आवाज मौन में लीन - 

Vijay Manohar Tiwari 18 May at 22:56 ·

#vijaymanohartiwari
स्वामी संवित सोमगिरि भारत की अद्वैत वेदांत दर्शन की एक ऐसी महीन और शालीन आवाज थे, जो धीरे-धीरे मन में उतरती जाती थी। वे गहन-गूढ़ माने जाने वाले अद्वैत को पंचतंत्र की कहानियों की तरह समझाने वाले प्रखर प्रवक्ताओं में थे। इस परंपरा के प्रवक्ता आपको गांव-शहरों में साल भर सजने वाले कथा-प्रवचन पांडालों में कभी नजर नहीं आएंगे। इसलिए उनके संसार का बहुत अल्प परिचय ही सामान्य भारतीयों को है। लेकिन देश के हर कोने में उनकी उपस्थिति सदियों से प्रवाहित है। प्राचीन भारत की ज्ञान परंपरा को जिन गुरुकुलों मंे सहेजकर रखा गया और एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को यह विरासत सौंपी, स्वामी संवित सोमगिरि ऐसे ही लोक के थे।

एक वर्ग ने अपनी आंखों पर स्वतंत्र भारत में भगवा परिधान और माथे पर तिलक वगैरह देखकर उपेक्षा की दूषित दृष्टि मोतियाबिंद की तरह विकसित की और इसे संक्रमण की तरह फैलाया। यह बताने की जरूरत नहीं है कि इस कुत्सित प्रयास के राजनीतिक निहितार्थ क्या थे और किन्हें इसके लाभ पहुंचे। सेक्युलर लाठी के सहारे एक पक्षीय और दिव्यांग लोकतंत्र के हाथों यह अपने ही चरण कमलों पर निरंतर चलाई गई कुल्हाड़ी थी। प्रगतिशीलता और अाधुनिकता का अबाया ओढ़कर हम अपनी मूल और सनातन पहचान पर स्वयं ही ग्रहण की तरह जम गए। यह सात दशकों का आपराधिक डिसकनेक्ट है, जो सेकुलर सत्ता के मुनाफाखोरों के लिए अत्यंत अनुकूल था। यह ऐसा आचरण था, जिसे उतने ही धैर्य से ग्रहण किया गया, जितने सब्र से सात-आठ सौ साल के आतंक और शोषण को झेला गया था। इसी के चलते किसी स्वामी संवित सोमगिरि का होना या न होना, किसी सूचना या समाचार का विषय नहीं बनता और दो कौड़ी के नेता, फिल्मी मसखरे या शायर मर जाएं तो देश की बड़ी क्षति हो जाती है।

लुप्त सरस्वती की तरह एक अद्दश्य सी धारा सदैव भारत की चेतना में बहती रही है। सतह पर रेत के अंधड़ों ने पूरी शक्ति से सब कुछ मिटा डालने की साैगंध खाई थी। संवित सोमगिरि उसी अमृत धारा के एक बिंदु मात्र थे। केवल भगवा वस्त्रों को देखकर दकियानूसी, मूढ़मति या अपढ़ समझने की समझदारी दिखाने वाले यह कभी न जानने का प्रयास करेंगे और नहीं बताने का कि संवित सोमगिरि 1966 में जोधपुर विवि से बीई मैकेनिकल थे। पांच साल लेक्चरर रहे और एक दिन एक ऐसे गुरू का साथ मिल गया कि संन्यास दीक्षा ले ली। अब वे वेदांत की शिक्षा और साधना के लोक में प्रतिष्ठित हो गए। इस भूमिका में रहकर समाज और देश काे उनका योगदान किसी विश्वविद्यालय या किसी समृद्ध संगठन के समूचे योगदान से भी बड़ा है, जाे शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, पर्यावरण, आध्यात्मिक विकास तक विस्तृत है। वे देश के हजारों युवाओं और विद्यार्थियांे से सीधे जुड़े थे और उनके बीच कई तरह की रचनात्मक गतिविधियों के सूत्रधार थे। उनका आश्रम प्राचीन काल के गुरुकुलों की तरह चहल-पहल से भरा हुआ रहा।

मुझे उनसे कई बार मिलने और उन्हें कई बार सुनने का अवसर मिला। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को उन्हाेंने अपनी वैज्ञानिक बुद्धि से परखा था। उनकी वाणी किसी भावुक कवि के ह्दय के झरने जैसी थी। वे आदि शंकराचार्य की परंपरा के वाहक थे। बीकानेर के अपने केंद्र में रहते हुए शूटिंग संस्थान की स्थापना का उल्लेख सबसे पहले करूंगा। सोमगिरि की 2002 की इस अनूठी पहल से कई निशानेबाज तैयार हुए। वैकल्पिक उपचार पद्धतियों के लिए अस्पताल बनाए। गीता ज्ञान की परीक्षा में हर साल हजारों विद्यार्थियों को जोड़ा। सरल भाषा में अद्वैत के विचार को युवा पीढ़ी और परिवारों में ले जाने के लिए दो दर्जन किताबें लिखीं और शिक्षा, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों के बुलावे पर देश भर में घूमे।

यह देश का दुर्भाग्य है कि इस ज्ञान परंपरा से हमारा तादात्म्य न्यूनतम है और हम इन विभूतियों को किसी मठ के संत-महंत कहकर हाशिए पर छोड़ते हुए आगे बढ़ जाते हैं। जबकि मैंने पाया कि भारत का मूल विचार सदियों के आतंकी अंधड़ों में इन्हीं की बदौलत बचा रहा है। ये वो लाेग थे, जिन्होंने अपने प्राणों का घेरा बनाकर दीए की कंपित लौ काे बुझने से बचाकर रखा। यह अधिक दुर्भाग्यपूर्ण था कि भारत की स्वतंत्रता इस बात की गारंटी नहीं बनी कि हमारा तंत्र इस विरासत को बचाकर रख पाएगा। सत्तर साल से अब उस लौ को बुझाने वाले हमारे अपने ही है। आत्मनिंदा एक फैशन है। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने की अाधुनिक परिभाषा के जन्मदाता हमारे ही प्रगतिशील आधुनिक हैं, जो सत्ता तंत्र से परजीवियों की तरह पोषण पाया।

लेकिन संवित सोमगिरि जैसी विभूतियों ने इन शक्तियों से किसी लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष में पड़ने, अड़ने या लड़ने, मरने-मारने, अपनी मांगों के लिए आक्रमण या आक्रोश करने की तरफ एक पग भी आगे नहीं बढ़ाया। वे अपने मौन में वही करते रहे जो दस सदियों से और उसके भी पहले से करते आ रहे हैं। उनके निकट गीता और उपनिषदों की महान व्याख्याएं थीं, जिनका वास्ता किसी धर्म विशेष से नहीं है। उनका गहरा संबंध मनुष्य और प्राणि मात्र से है। इस जगत में जन्में जीवन से है। मानव को श्रेष्ठ मानव बनने से है। मानव योनि में आकर ईश्वर के तत्व को प्राप्त करने से है। प्रकृति को समृद्ध करने से है। इसमें किसी प्रकार के कष्ट या शोषण का लेशमात्र नहीं है।

यह एक लंबी प्रक्रिया परंपरा है, जिसमें ऋषियों की अनगिनत पीढ़ियां खपी हैं और आखिरकार जिसे केरल के एक विलक्षण बालक ने 12 सौ साल पहले समय के किसी संयोग से ही एक मजबूत धागे में बांध दिया था। वह केरल के कालडि नाम के गांव से आया था। नियति ने उसे सिर्फ 32 साल की आयु दी थी। वह आदि शंकर थे। संवित सोमगिरि हमारे समकालीन ऋषि थे, जिनका नाभि जोड़ इसी वैचारिक धारा से है।

कोराेना की दूसरी विकराल लहर की विभीषिका में मैंने निश्चय किया था कि लहर के पूरी तरह शांत होने तक कुछ लिखूंगा नहीं। जिन्हें नियमित पढ़ता रहा हूं उनके लिखे को पढ़ा नियमित ही। कुछ अच्छी किताबें पढ़ीं। अखबार पलटे भर। न्यूज चैनलों के लिए दरवाजे-खिड़कियां बंद करके रखे। सुबह-शाम की गोलियों की तरह डिजीटल से अपडेट ही लीं। यूट्यूब के झरोखों से इतिहास आैर संस्कृति की जीवन दायी हवाएं आने दीं। संवित सोमगिरि के ब्रह्मलीन होने की वजह कोरोना ही बना, जिसने पिछले एक महीने में देश की ऐसी कई महान विभूतियों को हमसे छीन लिया, जो नैसर्गिक मृत्यु में अगले 30 सालों तक धीरे-धीरे जाते। वे हर आयु वर्ग के थे और किसी न किसी क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे थे। मृत्यु अटल है, यह हम सब जानते थे लेकिन वह एकमुश्त अटल हो सकती है, यह कोरोना ने बताया।
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